Allama Iqbal Shayari in Hindi & Urdu 2026 – 100+ Best Shayari, Quotes, Poetry & Ghazal Collection

Allama Iqbal Shayari in Hindi & Urdu 2026 – 100+ Best Shayari, Quotes, Poetry & Ghazal Collection
Allama Iqbal Urdu adab ke sabse azeem shayaron mein se ek maane jaate hain. Unki Shayari sirf alfaaz ka majmua nahi, balki khudi, ilm, insaniyat, mohabbat, roohaniyat aur watan se mohabbat ka paighaam hai. Unke ashaar har daur mein logon ko hausla dete hain aur apni pehchaan banane ki taleem dete hain. Is page par humne Allama Iqbal ki mashhoor Hindi aur Urdu Shayari ka ek behtareen collection tayyar kiya hai. Yahan aapko Khudi par Shayari, Motivational Shayari, Ishq Shayari, Watan Par Shayari, Zindagi Par Shayari, Dua Shayari aur unki mashhoor nazmon ke chuninda ashaar milenge. Har Shayari ko aasani se padh sakte hain, image ke saath dekh sakte hain aur WhatsApp, Facebook, Instagram ya kisi bhi social media platform par share kar sakte hain. Allama Iqbal ki Shayari ka sabse khaas pehlu unka "Khudi" ka falsafa hai. Woh insaan ko apni asli taqat pehchanne, mehnat karne aur buland maqsad ke saath zindagi jeene ki taleem dete hain. Isi wajah se unki Shayari aaj bhi students, writers, poets aur har umr ke logon ke liye inspiration bani hui hai. Agar aap Urdu adab ke shaukeen hain ya Allama Iqbal ke khoobsurat alfaaz padhna pasand karte hain, to yeh collection aapke liye ek behtareen jagah hai. Is page ko bookmark karein aur apne doston aur family ke saath zaroor share karein. Yahan hum waqt ke saath Allama Iqbal ki nayi aur mashhoor Shayari, Quotes aur Poetry ko lagataar update karte rehte hain, taaki aapko hamesha behtareen content milta rahe.
माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा तिरे सामने आसमाँ और भी हैं
तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा तिरे सामने आसमाँ और भी हैं
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं
अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन
अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन
तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
नशा पिला के गिराना तो सब को आता है मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी
नशा पिला के गिराना तो सब को आता है मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है
अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे
अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे
जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो
जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो
यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर
बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर
उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए
उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलिस्ताँ हमारा
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलिस्ताँ हमारा
अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है
अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है
दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी
तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी
मैं तुझ को बताता हूँ तक़दीर-ए-उमम क्या है शमशीर-ओ-सिनाँ अव्वल ताऊस-ओ-रुबाब आख़िर
मैं तुझ को बताता हूँ तक़दीर-ए-उमम क्या है शमशीर-ओ-सिनाँ अव्वल ताऊस-ओ-रुबाब आख़िर
जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते
जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते
अंदाज़-ए-बयाँ गरचे बहुत शोख़ नहीं है शायद कि उतर जाए तिरे दिल में मिरी बात
अंदाज़-ए-बयाँ गरचे बहुत शोख़ नहीं है शायद कि उतर जाए तिरे दिल में मिरी बात
नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में
नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में
ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें
ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें
मोहब्बत मुझे उन जवानों से है सितारों पे जो डालते हैं कमंद
मोहब्बत मुझे उन जवानों से है सितारों पे जो डालते हैं कमंद
वही जवाँ है क़बीले की आँख का तारा शबाब जिस का है बे-दाग़ ज़र्ब है कारी
वही जवाँ है क़बीले की आँख का तारा शबाब जिस का है बे-दाग़ ज़र्ब है कारी
ख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद कर जवानों को पीरों का उस्ताद कर
ख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद कर जवानों को पीरों का उस्ताद कर
कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में
कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में
अक़्ल गो आस्ताँ से दूर नहीं इस की तक़दीर में हुज़ूर नहीं
अक़्ल गो आस्ताँ से दूर नहीं इस की तक़दीर में हुज़ूर नहीं
बातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हम सौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमारा
बातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हम सौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमारा
हया नहीं है ज़माने की आँख में बाक़ी ख़ुदा करे कि जवानी तिरी रहे बे-दाग़
हया नहीं है ज़माने की आँख में बाक़ी ख़ुदा करे कि जवानी तिरी रहे बे-दाग़
मिरी ज़िंदगी का मक़्सद तिरे दीं की सरफ़राज़ी मैं इसी लिए मुसलमाँ मैं इसी लिए नमाज़ी
मिरी ज़िंदगी का मक़्सद तिरे दीं की सरफ़राज़ी मैं इसी लिए मुसलमाँ मैं इसी लिए नमाज़ी
कभी ऐ नौजवाँ मुस्लिम तदब्बुर भी किया तू ने वो क्या गर्दूं था तू जिस का है इक टूटा हुआ तारा
कभी ऐ नौजवाँ मुस्लिम तदब्बुर भी किया तू ने वो क्या गर्दूं था तू जिस का है इक टूटा हुआ तारा
मुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब ने तलातुम हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबी
मुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब ने तलातुम हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबी
ज़ाहिर की आँख से न तमाशा करे कोई हो देखना तो दीदा-ए-दिल वा करे कोई
ज़ाहिर की आँख से न तमाशा करे कोई हो देखना तो दीदा-ए-दिल वा करे कोई
ज़माना अक़्ल को समझा है मश्अल-ए-राह किसे ख़बर कि जुनूँ भी है साहिब-ए-इरशाद
ज़माना अक़्ल को समझा है मश्अल-ए-राह किसे ख़बर कि जुनूँ भी है साहिब-ए-इरशाद
इक़बाल बड़ा उपदेशक है मन बातों में मोह लेता है गुफ़्तार का ये ग़ाज़ी तो बना किरदार का ग़ाज़ी बन न सका
इक़बाल बड़ा उपदेशक है मन बातों में मोह लेता है गुफ़्तार का ये ग़ाज़ी तो बना किरदार का ग़ाज़ी बन न सका
दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना आदमियत है यही और यही इंसाँ होना
दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना आदमियत है यही और यही इंसाँ होना
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
वो फ़रेब-ख़ुर्दा शाहीं कि पला हो कर्गुसों में उसे क्या ख़बर कि क्या है रह-ओ-रस्म-ए-शाहबाज़ी
वो फ़रेब-ख़ुर्दा शाहीं कि पला हो कर्गुसों में उसे क्या ख़बर कि क्या है रह-ओ-रस्म-ए-शाहबाज़ी
ख़िरद ने कह भी दिया ला-इलाह तो क्या हासिल दिल-ओ-निगाह मुसलमाँ नहीं तो कुछ भी नहीं
ख़िरद ने कह भी दिया ला-इलाह तो क्या हासिल दिल-ओ-निगाह मुसलमाँ नहीं तो कुछ भी नहीं
अगर उस्मानीओं पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म है कि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदा
अगर उस्मानीओं पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म है कि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदा
मैं कि मेरी ग़ज़ल में है आतिश-ए-रफ़्ता का सुराग़ मेरी तमाम सर्गुज़श्त खोए हुओं की जुस्तुजू
मैं कि मेरी ग़ज़ल में है आतिश-ए-रफ़्ता का सुराग़ मेरी तमाम सर्गुज़श्त खोए हुओं की जुस्तुजू
न पूछ इन ख़िरक़ा-पोशों की अक़ीदत हो तो देख इन को यद-ए-बैज़ा लिए बैठे हैं अपनी आस्तीनों में
न पूछ इन ख़िरक़ा-पोशों की अक़ीदत हो तो देख इन को यद-ए-बैज़ा लिए बैठे हैं अपनी आस्तीनों में
मिरा तरीक़ अमीरी नहीं फ़क़ीरी है ख़ुदी न बेच ग़रीबी में नाम पैदा कर
मिरा तरीक़ अमीरी नहीं फ़क़ीरी है ख़ुदी न बेच ग़रीबी में नाम पैदा कर
हक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी हो लहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरें
हक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी हो लहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरें
है जुर्म-ए-ज़ईफ़ी की सज़ा मर्ग-ए-मुफ़ाजात तारीख़-ए-उमम का ये पयाम-ए-अज़ली है
है जुर्म-ए-ज़ईफ़ी की सज़ा मर्ग-ए-मुफ़ाजात तारीख़-ए-उमम का ये पयाम-ए-अज़ली है
क़नाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर चमन और भी आशियाँ और भी हैं
क़नाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर चमन और भी आशियाँ और भी हैं
न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए जहाँ है तेरे लिए तू नहीं जहाँ के लिए
न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए जहाँ है तेरे लिए तू नहीं जहाँ के लिए
तू अभी रहगुज़र में है क़ैद-ए-मक़ाम से गुज़र मिस्र-ओ-हिजाज़ से गुज़र पारस-ओ-शाम से गुज़र
तू अभी रहगुज़र में है क़ैद-ए-मक़ाम से गुज़र मिस्र-ओ-हिजाज़ से गुज़र पारस-ओ-शाम से गुज़र
तिरी दुआ है कि हो तेरी आरज़ू पूरी मिरी दुआ है तिरी आरज़ू बदल जाए
तिरी दुआ है कि हो तेरी आरज़ू पूरी मिरी दुआ है तिरी आरज़ू बदल जाए
ये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल में यहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरी
ये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल में यहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरी
फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है
फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है
ज़मीं ओ आसमाँ ख़ाली हैं मेरी आहो-ज़ारी से न कोई आश्ना मेरा न कोई ग़म-गुसार मेरा
ज़मीं ओ आसमाँ ख़ाली हैं मेरी आहो-ज़ारी से न कोई आश्ना मेरा न कोई ग़म-गुसार मेरा
उठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो काख़-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो
उठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो काख़-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो
इक़बाल कोई महरम अपना नहीं जहाँ में मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा
इक़बाल कोई महरम अपना नहीं जहाँ में मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा
तूने ये क्या ग़ज़ब किया मुझको भी फ़ाश कर दिया मैं ही तो एक राज़ था सीना-ए-काएनात में
तूने ये क्या ग़ज़ब किया मुझको भी फ़ाश कर दिया मैं ही तो एक राज़ था सीना-ए-काएनात में
ख़ुदा के बंदे तो हैं हज़ारों बनो में फिरते हैं मारे मारे मैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगा
ख़ुदा के बंदे तो हैं हज़ारों बनो में फिरते हैं मारे मारे मैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगा
ये एक सज्दा जिसे तू गिराँ समझता है हज़ार सज्दों से देता है आदमी को नजात
ये एक सज्दा जिसे तू गिराँ समझता है हज़ार सज्दों से देता है आदमी को नजात
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरी ख़ामोशी गुफ़्तगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरी
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरी ख़ामोशी गुफ़्तगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरी
चमन में तल्ख़-नवाई मिरी गवारा कर कि ज़हर भी कभी करता है कार-ए-तिर्याक़ी
चमन में तल्ख़-नवाई मिरी गवारा कर कि ज़हर भी कभी करता है कार-ए-तिर्याक़ी
हक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गई ये उम्मत रिवायात में खो गई
हक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गई ये उम्मत रिवायात में खो गई
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबी उफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबी
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबी उफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबी
दिल-ए-मुर्दा दिल नहीं है इसे ज़िंदा कर दोबारा कि यही है उम्मतों के मर्ज़-ए-कुहन का चारा
दिल-ए-मुर्दा दिल नहीं है इसे ज़िंदा कर दोबारा कि यही है उम्मतों के मर्ज़-ए-कुहन का चारा
जहान-ए-ताज़ा की अफ़्कार-ए-ताज़ा से है नमूद कि संग-ओ-ख़िश्त से होते नहीं जहाँ पैदा
जहान-ए-ताज़ा की अफ़्कार-ए-ताज़ा से है नमूद कि संग-ओ-ख़िश्त से होते नहीं जहाँ पैदा
ये काएनात अभी ना-तमाम है शायद कि आ रही है दमादम सदा-ए-कुन-फ़यकून
ये काएनात अभी ना-तमाम है शायद कि आ रही है दमादम सदा-ए-कुन-फ़यकून
अगरचे बुत हैं जमाअत की आस्तीनों में मुझे है हुक्म-ए-अज़ाँ ला-इलाह-इल्लल्लाह
अगरचे बुत हैं जमाअत की आस्तीनों में मुझे है हुक्म-ए-अज़ाँ ला-इलाह-इल्लल्लाह
तिरे सीने में दम है दिल नहीं है तिरा दम गर्मी-ए-महफ़िल नहीं है
तिरे सीने में दम है दिल नहीं है तिरा दम गर्मी-ए-महफ़िल नहीं है
अतार हो रूमी हो राज़ी हो ग़ज़ाली हो कुछ हाथ नहीं आता बे-आह-ए-सहर-गाही
अतार हो रूमी हो राज़ी हो ग़ज़ाली हो कुछ हाथ नहीं आता बे-आह-ए-सहर-गाही
जलाल-ए-पादशाही हो कि जम्हूरी तमाशा हो जुदा हो दीं सियासत से तो रह जाती है चंगेज़ी
जलाल-ए-पादशाही हो कि जम्हूरी तमाशा हो जुदा हो दीं सियासत से तो रह जाती है चंगेज़ी
तिरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गए शब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गए
तिरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गए शब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गए
ऐ ताइर-ए-लाहूती उस रिज़्क़ से मौत अच्छी जिस रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही
ऐ ताइर-ए-लाहूती उस रिज़्क़ से मौत अच्छी जिस रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में
मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे कि दाना ख़ाक में मिल कर गुल-ए-गुलज़ार होता है
मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे कि दाना ख़ाक में मिल कर गुल-ए-गुलज़ार होता है
निगाह-ए-फ़क़्र में शान-ए-सिकंदरी क्या है ख़िराज की जो गदा हो वो क़ैसरी क्या है
निगाह-ए-फ़क़्र में शान-ए-सिकंदरी क्या है ख़िराज की जो गदा हो वो क़ैसरी क्या है
बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से नौमीदी मुझे बता तो सही और काफ़िरी क्या है
बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से नौमीदी मुझे बता तो सही और काफ़िरी क्या है
न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ न वो ग़ज़नवी में तड़प रही न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में
न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ न वो ग़ज़नवी में तड़प रही न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में
कोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू का निगाह-ए-मर्दे-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरें
कोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू का निगाह-ए-मर्दे-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरें
ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं तिरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं
ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं तिरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं
जहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैं इधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकले
जहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैं इधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकले
हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं
हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं
अगर हो इश्क़ तो है कुफ़्र भी मुसलमानी न हो तो मर्द-ए-मुसलमाँ भी काफ़िर-ओ-ज़िंदीक़
अगर हो इश्क़ तो है कुफ़्र भी मुसलमानी न हो तो मर्द-ए-मुसलमाँ भी काफ़िर-ओ-ज़िंदीक़
मुसलमाँ के लहू में है सलीक़ा दिल-नवाज़ी का मुरव्वत हुस्न-ए-आलम-गीर है मर्दान-ए-ग़ाज़ी का
मुसलमाँ के लहू में है सलीक़ा दिल-नवाज़ी का मुरव्वत हुस्न-ए-आलम-गीर है मर्दान-ए-ग़ाज़ी का
कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए
कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए
मुझे रोकेगा तू ऐ ना-ख़ुदा क्या ग़र्क़ होने से कि जिन को डूबना हो डूब जाते हैं सफ़ीनों में
मुझे रोकेगा तू ऐ ना-ख़ुदा क्या ग़र्क़ होने से कि जिन को डूबना हो डूब जाते हैं सफ़ीनों में
अजब वाज़-ए-नासेह अजब है मिरी तौबा कि वो भी नहीं सुनता ये भी नहीं होती
अजब वाज़-ए-नासेह अजब है मिरी तौबा कि वो भी नहीं सुनता ये भी नहीं होती
तिरी निगाह-ए-फ़रो-माया हाथ है कोताह तिरा गुनाह कि नाख़्ल-ए-बुलंद का है गुनाह
तिरी निगाह-ए-फ़रो-माया हाथ है कोताह तिरा गुनाह कि नाख़्ल-ए-बुलंद का है गुनाह
तू रज़ा-ए-इलाही की तमन्ना में है गुम और ख़ुदा तेरी रज़ा का है तलबगार अभी
तू रज़ा-ए-इलाही की तमन्ना में है गुम और ख़ुदा तेरी रज़ा का है तलबगार अभी
तिरे अता किए हुए हैं ये दिल ये जान मेरे तिरी ही याद में गुज़रें ये दिन ये रात मेरे
तिरे अता किए हुए हैं ये दिल ये जान मेरे तिरी ही याद में गुज़रें ये दिन ये रात मेरे
मिरी ज़बान पे शिकवा है आस्मानों का कि मेरे दिल में है दर्द-ए-निहाँ ज़मानों का
मिरी ज़बान पे शिकवा है आस्मानों का कि मेरे दिल में है दर्द-ए-निहाँ ज़मानों का
मक़ाम-ए-परवरिश-ए-आह-ओ-नाला है ये चमन न यहाँ गुल की है क़ीमत न ख़ार की क़ीमत
मक़ाम-ए-परवरिश-ए-आह-ओ-नाला है ये चमन न यहाँ गुल की है क़ीमत न ख़ार की क़ीमत
हयात-ए-ताज़ा अपने साथ लाती है नई तर्ज़ें नया अंदाज़ होता है नए अफ़्कार होते हैं
हयात-ए-ताज़ा अपने साथ लाती है नई तर्ज़ें नया अंदाज़ होता है नए अफ़्कार होते हैं
जो बात हक़ हो वो मुझ से छुपी नहीं रहती मैं तो ख़ुद ही अपने दिल का राज़-दाँ हूँ
जो बात हक़ हो वो मुझ से छुपी नहीं रहती मैं तो ख़ुद ही अपने दिल का राज़-दाँ हूँ
वो मज़ा दिया तड़प ने कि ये आरज़ू है या रब मिरे दोनों पहलूओं में दिल-ए-बे-क़रार होता
वो मज़ा दिया तड़प ने कि ये आरज़ू है या रब मिरे दोनों पहलूओं में दिल-ए-बे-क़रार होता
ये भी इक हुस्न-ए-इरादा है कि मैं ने उस को अपने अफ़्कार की दुनिया में बसा रक्खा है
ये भी इक हुस्न-ए-इरादा है कि मैं ने उस को अपने अफ़्कार की दुनिया में बसा रक्खा है
मैं असल-ए-शहीद-ए-वफ़ा हूँ मुझे क्या ग़म कि मौत भी आए तो मिरी जान न जाए
मैं असल-ए-शहीद-ए-वफ़ा हूँ मुझे क्या ग़म कि मौत भी आए तो मिरी जान न जाए
न कर ज़िक्र-ए-फ़िराक़-ए-यार मुद्दत हो गई इस को वो इक भूली हुई दास्तान है अब याद क्या करना
न कर ज़िक्र-ए-फ़िराक़-ए-यार मुद्दत हो गई इस को वो इक भूली हुई दास्तान है अब याद क्या करना
वो कोई और चराग़ होंगे जो हवाओं से बुझ गए मैं तो वो शमा हूँ जो आँधियों में भी जलती रही
वो कोई और चराग़ होंगे जो हवाओं से बुझ गए मैं तो वो शमा हूँ जो आँधियों में भी जलती रही
क्या इश्क़ एक ज़िंदगी-ए-मुस्तआ'र का क्या इश्क़ पा-ए-दार से ना-पा-ए-दार का
क्या इश्क़ एक ज़िंदगी-ए-मुस्तआ'र का क्या इश्क़ पा-ए-दार से ना-पा-ए-दार का
अजब नहीं कि ख़ुदा तक तिरी रसाई हो तिरी निगाह से है पोशीदा आदमी का मक़ाम
अजब नहीं कि ख़ुदा तक तिरी रसाई हो तिरी निगाह से है पोशीदा आदमी का मक़ाम
ख़ुदी की ख़ल्वत-ए-रंगीं में है तिरा मक़्सूद तिरी मुराद तिरे दिल की आरज़ू क्या है
ख़ुदी की ख़ल्वत-ए-रंगीं में है तिरा मक़्सूद तिरी मुराद तिरे दिल की आरज़ू क्या है
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