Alone Sad Shayari in Hindi: तन्हाई और अकेलेपन की चुभन पर 20 रुहानी शायरी
अकेलापन सिर्फ किसी कमरे में अकेले बैठने का नाम नहीं है, बल्कि भरी महफ़िल में अपनेपन की तलाश में खाली हाथ रह जाने का नाम है। जब आपके पास अपनी खुशियाँ या तकलीफ़ें बांटने के लिए कोई एक सच्चा इंसान भी न हो, तो वह सन्नाटा अंदर ही अंदर गूंजने लगता है। तन्हाई में इंसान अपने ही ख्यालों से लड़ता है और पुरानी यादों के साए में घुटता रहता है।
रात की खामोशी में जब दीवारें भी बोलने लगती हैं और तन्हा दिल अपनी ही धड़कनों से डरने लगता है, तब शायरी ही एकमात्र ऐसा हमदर्द बनती है जो बिना किसी शिकायत के हर दर्द सुन लेती है। 'Alone Sad Shayari' का यह संग्रह उन सभी तन्हा दिलों को समर्पित है जो हर रोज़ अकेलेपन की जंग लड़ रहे हैं।
रात के सन्नाटे में जब खामोशी चीखती है,
कमरे की हर दीवार मुझे तन्हाई का ताना देती है।
रात के सन्नाटे में जब खामोशी चीखती है,
कमरे की हर दीवार मुझे तन्हाई का ताना देती है।
भीड़ इतनी है इस शहर में कि साँस लेना मुश्किल है,
मगर दिल का कोना आज भी पूरी तरह वीरान है।
भीड़ इतनी है इस शहर में कि साँस लेना मुश्किल है,
मगर दिल का कोना आज भी पूरी तरह वीरान है।
खुद से ही बातें करने का सलीका सीख लिया हमने,
क्योंकि ज़माने में कोई हमारा सुनने वाला न था।
खुद से ही बातें करने का सलीका सीख लिया हमने,
क्योंकि ज़माने में कोई हमारा सुनने वाला न था।
तन्हाई का यह ज़हर धीरे-धीरे उतर रहा है रगों में,
अब तो अपनी ही परछाई से ख़ौफ़ आने लगा है।
तन्हाई का यह ज़हर धीरे-धीरे उतर रहा है रगों में,
अब तो अपनी ही परछाई से ख़ौफ़ आने लगा है।
महफ़िलों में हँसने का हुनर तो सीख लिया हमने,
मगर तन्हाई में रोने की आदत आज भी न छूटी।
महफ़िलों में हँसने का हुनर तो सीख लिया हमने,
मगर तन्हाई में रोने की आदत आज भी न छूटी।
न कोई दस्तक है दरवाज़े पे, न किसी की आहट है,
मेरी इस वीरान ज़िंदगी में बस खामोशी की हुकूमत है।
न कोई दस्तक है दरवाज़े पे, न किसी की आहट है,
मेरी इस वीरान ज़िंदगी में बस खामोशी की हुकूमत है।
सफ़र में साथ चलने का वादा तो बहुतों ने किया था,
मगर जब मुसाफ़िर गिरे तो कोई हाथ थामने वाला न था।
सफ़र में साथ चलने का वादा तो बहुतों ने किया था,
मगर जब मुसाफ़िर गिरे तो कोई हाथ थामने वाला न था।
अकेलेपन की चादर ओढ़कर रात भर जागते हैं,
हम वो मुसाफिर हैं जो अपनी ही तलाश में भटकते हैं।
अकेलेपन की चादर ओढ़कर रात भर जागते हैं,
हम वो मुसाफिर हैं जो अपनी ही तलाश में भटकते हैं।
कोई हाल भी पूछे तो मुस्कुरा कर 'ठीक हूँ' कह देते हैं,
क्योंकि इस तन्हाई का दर्द समझाने की ताक़त अब नहीं रही।
कोई हाल भी पूछे तो मुस्कुरा कर 'ठीक हूँ' कह देते हैं,
क्योंकि इस तन्हाई का दर्द समझाने की ताक़त अब नहीं रही।
खाली कुर्सियां और ठंडी होती चाय का प्याला,
बस यही बचा है मेरे इस सूने आशियाने में।
खाली कुर्सियां और ठंडी होती चाय का प्याला,
बस यही बचा है मेरे इस सूने आशियाने में।
तन्हाई भी अब हमारी वफ़ादार सहेली बन चुकी है,
ज़माना छोड़ गया मगर यह कभी साथ नहीं छोड़ती।
तन्हाई भी अब हमारी वफ़ादार सहेली बन चुकी है,
ज़माना छोड़ गया मगर यह कभी साथ नहीं छोड़ती।
आँखों के आंसुओं को पोंछने वाला कोई हाथ नहीं,
इस वीराने में चीखने का भी कोई फ़ायदा नहीं।
आँखों के आंसुओं को पोंछने वाला कोई हाथ नहीं,
इस वीराने में चीखने का भी कोई फ़ायदा नहीं।
चराग़ बुझते ही जब अंधेरा कमरे को घेर लेता है,
तेरी तन्हाई का साया मेरी रूह पे पहरा देता है।
चराग़ बुझते ही जब अंधेरा कमरे को घेर लेता है,
तेरी तन्हाई का साया मेरी रूह पे पहरा देता है।
किससे कहें कि दिल के अंदर कितना बड़ा बवंडर है,
यहाँ हर शख्स अपने ही मतलब के समंदर में तैर रहा है।
किससे कहें कि दिल के अंदर कितना बड़ा बवंडर है,
यहाँ हर शख्स अपने ही मतलब के समंदर में तैर रहा है।
एक वक्त था जब हमारी एक आवाज़ पे महफ़िल जुटती थी,
आज चीखने पर भी कोई मुड़कर देखने वाला नहीं।
एक वक्त था जब हमारी एक आवाज़ पे महफ़िल जुटती थी,
आज चीखने पर भी कोई मुड़कर देखने वाला नहीं।
तन्हा रहने का सबसे बड़ा नुक़सान यह है,
कि दर्द कितना भी हो, सम्हालने वाला कोई नहीं होता।
तन्हा रहने का सबसे बड़ा नुक़सान यह है,
कि दर्द कितना भी हो, सम्हालने वाला कोई नहीं होता।
सर्द रातों में सिर्फ यादों की धूनी जलाए बैठे हैं,
हम अपनी ही तन्हाई से शर्त लगाए बैठे हैं।
सर्द रातों में सिर्फ यादों की धूनी जलाए बैठे हैं,
हम अपनी ही तन्हाई से शर्त लगाए बैठे हैं।
आईना भी अब देखकर मुझपे तरस खाता है,
कि इस हँसते हुए चेहरे के पीछे कितना अकेला इंसान है।
आईना भी अब देखकर मुझपे तरस खाता है,
कि इस हँसते हुए चेहरे के पीछे कितना अकेला इंसान है।
न किसी का इंतज़ार रहा, न किसी की तलब बाकी,
तन्हाई ने इस दिल को पूरी तरह पत्थर बना दिया।
न किसी का इंतज़ार रहा, न किसी की तलब बाकी,
तन्हाई ने इस दिल को पूरी तरह पत्थर बना दिया।
जब कोई अपना ही बेगाना बन जाए भरे बाज़ार में,
तो अकेलापन ही ज़िंदगी का सबसे महफूज़ कोना लगता है।
जब कोई अपना ही बेगाना बन जाए भरे बाज़ार में,
तो अकेलापन ही ज़िंदगी का सबसे महफूज़ कोना लगता है।