Painful Sad Shayari in Hindi: सीने के दर्द और बेबसी को चीर देने वाले 20 अश'आर
ज़िंदगी में कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो न तो किसी को दिखाए जा सकते हैं और न ही किसी से कहे जा सकते हैं। वे बस सीने के अंदर एक गहरे नासूर की तरह धीरे-धीरे रिसते रहते हैं। जब उम्मीदों के सारे महल ढह जाते हैं और जिन पर खुद से ज्यादा ऐतबार था वही सबसे गहरा ज़ख्म दे जाते हैं, तब इंसान की रूह तक कांप उठती है।
दर्द भरी शायरी उस मूक वेदना का दर्पण है जिसे इंसान सिर्फ अपनी भीगी पलकों और ठंडी आहों में छुपा कर रखता है। यह पोस्ट उन गहरे घावों, आंसुओं के समंदर और दिल की बेबसी को समर्पित है। 'Painful Sad Shayari' के ये अश'आर आपकी आत्मा के उस हिस्से को छू लेंगे जहाँ सिर्फ दर्द का बसेरा है।
हँसते हुए चेहरों के पीछे कितना दर्द छुपा है,
यह तो बस वही जानता है जिसका दिल रोज़ मरा है।
हँसते हुए चेहरों के पीछे कितना दर्द छुपा है,
यह तो बस वही जानता है जिसका दिल रोज़ मरा है।
ज़ख्म इतने गहरे हैं कि मरहम भी जलने लगता है,
अब तो हर सांस के साथ सीने में दर्द सा उठता है।
ज़ख्म इतने गहरे हैं कि मरहम भी जलने लगता है,
अब तो हर सांस के साथ सीने में दर्द सा उठता है।
हमने तो दर्द को भी मुस्कुरा कर गले लगाया,
मगर कमबख्त दर्द ने भी हमें कभी वफ़ादार न समझा।
हमने तो दर्द को भी मुस्कुरा कर गले लगाया,
मगर कमबख्त दर्द ने भी हमें कभी वफ़ादार न समझा।
आँखों से बहते हुए पानी को लोग पानी समझते हैं,
कोई क्या जाने कि यह जलती हुई रूह का धुआं है।
आँखों से बहते हुए पानी को लोग पानी समझते हैं,
कोई क्या जाने कि यह जलती हुई रूह का धुआं है।
इतना दर्द सहा है तेरी मोहब्बत की राहों में,
कि अब खुशियों की आहट से भी डर लगने लगा है।
इतना दर्द सहा है तेरी मोहब्बत की राहों में,
कि अब खुशियों की आहट से भी डर लगने लगा है।
सीने में जो चुभन है उसका कोई इलाज नहीं,
हम उस आज़माइश में हैं जिसका कोई आगाज़ नहीं।
सीने में जो चुभन है उसका कोई इलाज नहीं,
हम उस आज़माइश में हैं जिसका कोई आगाज़ नहीं।
रोज़ एक नया ज़ख्म मिलता है अपनों के हाथों,
हमने तो अब दर्द की गिनती करना भी छोड़ दिया।
रोज़ एक नया ज़ख्म मिलता है अपनों के हाथों,
हमने तो अब दर्द की गिनती करना भी छोड़ दिया।
रात भर जाग कर तकिये को आंसुओं से भिगोना,
कितना तकलीफ़देह होता है किसी के लिए बेबस होना।
रात भर जाग कर तकिये को आंसुओं से भिगोना,
कितना तकलीफ़देह होता है किसी के लिए बेबस होना।
चीखना चाहते हैं मगर गले से आवाज़ नहीं निकलती,
इस बेबसी के आगे तो मौत भी आसान लगने लगती है।
चीखना चाहते हैं मगर गले से आवाज़ नहीं निकलती,
इस बेबसी के आगे तो मौत भी आसान लगने लगती है।
खामोश रहकर हमने हर सितम को बर्दाश्त किया,
मगर ज़माने ने समझा कि हमें कोई तकलीफ़ ही नहीं।
खामोश रहकर हमने हर सितम को बर्दाश्त किया,
मगर ज़माने ने समझा कि हमें कोई तकलीफ़ ही नहीं।
दिल के नासूर अब इस कदर नासूर बन चुके हैं,
कि हवा का एक हल्का सा झोंका भी तड़पा देता है।
दिल के नासूर अब इस कदर नासूर बन चुके हैं,
कि हवा का एक हल्का सा झोंका भी तड़पा देता है।
खुदा ने भी दर्द देने में कोई कसर न छोड़ी,
और हम भी पत्थर बनके हर वार सहते चले गए।
खुदा ने भी दर्द देने में कोई कसर न छोड़ी,
और हम भी पत्थर बनके हर वार सहते चले गए।
तेरी याद का आना भी अब एक सज़ा सा लगता है,
जो हर बार पुराने ज़ख्मों को फिर से ताज़ा कर जाता है।
तेरी याद का आना भी अब एक सज़ा सा लगता है,
जो हर बार पुराने ज़ख्मों को फिर से ताज़ा कर जाता है।
वो दर्द ही क्या जो लफ़्ज़ों में आसानी से ढल जाए,
सच्चा दर्द तो वो है जो अंदर ही अंदर इंसान को निगल जाए।
वो दर्द ही क्या जो लफ़्ज़ों में आसानी से ढल जाए,
सच्चा दर्द तो वो है जो अंदर ही अंदर इंसान को निगल जाए।
हर रोज़ अपनी ही लाश को कंधा देकर चलते हैं,
हम वो ज़िंदा मुर्दे हैं जो बस सांसों के सहारे पलते हैं।
हर रोज़ अपनी ही लाश को कंधा देकर चलते हैं,
हम वो ज़िंदा मुर्दे हैं जो बस सांसों के सहारे पलते हैं।
इम्तिहान लेते-लेते ज़िंदगी भी शायद थक गई होगी,
मगर हमारे हिस्से का दर्द कभी कम न हुआ।
इम्तिहान लेते-लेते ज़िंदगी भी शायद थक गई होगी,
मगर हमारे हिस्से का दर्द कभी कम न हुआ।
जब अपने ही हाथों से अपने सपनों का गला घोंटना पड़े,
उस दर्द की बराबरी दुनिया का कोई जहर नहीं कर सकता।
जब अपने ही हाथों से अपने सपनों का गला घोंटना पड़े,
उस दर्द की बराबरी दुनिया का कोई जहर नहीं कर सकता।
पलकों की मुंडेर पे जो अश्क ठहर जाते हैं,
वो दिल के सबसे गहरे समंदर की गवाही देते हैं।
पलकों की मुंडेर पे जो अश्क ठहर जाते हैं,
वो दिल के सबसे गहरे समंदर की गवाही देते हैं।
दर्द की भी अपनी एक अलग ही ज़ुबान होती है,
जो सिर्फ तन्हाई के सजदों में समझ आती है।
दर्द की भी अपनी एक अलग ही ज़ुबान होती है,
जो सिर्फ तन्हाई के सजदों में समझ आती है।
हम तो उस मुकाम पे आ पहुँचे हैं दर्द के सफ़र में,
जहाँ अब राहत की दुआ माँगना भी गुनाह लगता है।
हम तो उस मुकाम पे आ पहुँचे हैं दर्द के सफ़र में,
जहाँ अब राहत की दुआ माँगना भी गुनाह लगता है।